श्री कृष्ण कृपा
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे
सेवा में तनिक भी अहंभाव नही |मैं नही कर रहा ,भगवत-कृपा से हो
रहा हैं;यह भाव बनाएं |
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"खुले रहो खिले रहो
,खली रहो '-ऐसे जीवन और पारिवारिक जीवन का आदर्श बनाओ
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जो पास हैं ,वह सब प्रभु की कृपा,जो दिख रहा हैं,वह सब उसकी लीला ,सब प्राणियों में उसी की सत्ता ;मैं -मेरा कही नही |ऐसे भाव से प्रेम स्वतः बढ़ेगा |
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जीवन रूपी रथ का सारथि हैं बुद्धि ! अर्जुन बन जाओ ,सारथि श्री कृष्ण को बना लो ; जीवन संग्राम में विजय निश्चित हैं !
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जब अहंकार में जीते हैं तो स्वयं को बहुत बोना ,बहुत छोटा बना
लेते हैं ! अहंकार से ऊपर उठ कर देखो -सब अपने हैं और आप सब के
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सामर्थ्य यही मिली हैं ,यही रहनी हैं !
प्रभु की भाव से किया गया सदुपयोग यह सम्मान बढ़ाएगा ,आगे साथ निभाएगा |
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जब तक भीतर चिंता -चिंतन एवं वृत्तियों -विकारो से भरे
रहोगे ,तब-तक खाली ही हो |
अंदर से खाली हो जाओ ; प्रेम ,शांति,करुणा ,आनंद और कृपा से भर जाओगे |
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माता पिता बड़े-बुजुर्गो का सम्मान अत्यावश्यक हैं |उनकी प्रसन्नता का कारण बनो परेशानी का नही ||
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प्रेम संसार की सब से मूलयवान सम्पदा हैं |मन में प्रेम ,परिवारो में प्रेम
,समाज में पारिवारिक प्रेम और प्रभु से प्रेम-यही स्वर्ग हैं ,यही कलयुग में भी
सतयुग |
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सामर्थ्य की सदुपयोग का नाम ही सेवा हैं | सेवा सच्ची मानवता
हैं ,सेवा परमात्मा की सहज पूजा और सीधी प्रसन्नता हैं
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काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार,ईर्ष्या-द्वेष आदि वृत्तियों में ही नही जियो ईश्वरीय प्रेम और
कृपा में जीने का आनंद लो | ईर्ष्या,द्वेष,मत्सर,आक्रोश की अग्नि
में मत जलो;प्रेम ,भक्ति-भाव,सदभाव की शीतल धारा में डुबकी लगाओ |
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