Monday, 9 November 2015

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-8

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे

शाश्वत शांति के लिये,शांति की इच्छा नही;इच्छाओ  की शांति

***********************

प्रेम की दुनिया में 'दो'  का प्रवेश नही |'मैं' को छोड़ो 'तू ही तू 'से नाता जोड़ो |

************************

मीठा बोले |कड़वा एवं अहित कर वचन बोलने से अच्छा मौन रहे |

***********************

गो सेवा और गीता पाठ
नित्य नियम से मंत्रजाप |
करते रहो जब तक हैं स्वांस ||

**************************


सतसंग सेवा सुमिरन हो बना रहे सदभाव |
शांत मन और मिट्ठी वाणी शीतल हो स्वभाव ||

          ********************

बड़प्पन किसी छोटे को निचा दिखने में नही ,उसे गले लगाने ,ऊँचा उठाने में हैं

********************

माता-पिता जन्म देते हैं और गुरु जीवन ! मातृ देवोभव  ,पितृ देवोभव  और आचार्य देवोभव ही हमारी भारीतय संस्कृति इसीलिए धन्य ओर प्रणम्य हैं ! 

************
महाराज जी द्वारा रचित ऐसे और जीवन उपयोगी विचार जो विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे साहित्य में से कुछ यहाँ प्रकाशित किये गये हैं उनका और लाभ लेने के लिए एवं अन्य साहित्यो जैसे 

* गीता प्रेरणा

* ज्ञान साधना

* कृपा

* भजनांजली

* मेरा विश्वास

* अनुभव प्रसाद

* बना लो गीता जीवन गीत

* बढे सन्मार्ग की ओर

* ज्ञान छंदवाली

* गीता ज्ञान सुधा

* विचार मंथन

* जिओ गीता के संग

* कृपा(In English)

*Thought for bliss full life

*Lets's Move on right 

 का लाभ लेने के लिए आप आप निम्नलिखित पते पर संपर्क कर सकते हैं

श्री कृष्ण कृपा धाम ,परिक्रमा मार्ग ,वृन्दावन
फ़ोन :  (0565)-2540418,2540106,3206418,3206106
Email:sri_krishnakripa@yahoo.co.in

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-7

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे

बात बात में स्वयं परेशान होने और दुसरो को परेशान करने से परहेज़ करे |
********************************

आत्म निरिक्षण अवश्य करते रहे |सोने से पूर्व रोज देखे -मेरा आज का दिन कैसे निकला !

********************************

कर्म का त्याग नही ,त्याग भाव से कर्म करो |

*********************************

अच्छा साहित्य पढ़ने का सवभाव बनाएं ! साथ साथ कभी कभी जीवन के पुस्तक को भी पढ़े |

**********************************

विचार ही उठाते हैं और विचार ही गिराते हैं |शुभ विचार  जीवन का उत्थान हैं,,अशुभ विचार पतन !
सकारात्मक सोच(पॉजिटिव थिंकिंग) रखें ,नकारात्मक (नेगेटिव) नही |सोच आशावादी,उत्साहवादी हो,निराशावादी नही !शांति-अशांति इसी पर निर्भर हैं |

************************************

गुणग्राही बने |अवगुणो में भी गुण देखे |अच्छाई का वर्ण करे ,अच्छे बने |

***********************************

किसी भी कारण से बुद्धि नही बिगड़े,ऐसा प्रयास करो और भगवान से प्रार्थना भी |

*********************************

अच्छा दिखने या कहलवाने के ही आदत नही ,अच्छा बनने का प्रयास करो |अच्छा वही,जिसके कर्म ऊँचे हैं |

********************************

बिज़ली के उपकरण अनेक हैं ,लेकिन उन्हें चलाने वाला करंट एक |रूप रंग वर्ण वर्ग अनेक लेकिन ईश्वरीय चेतना का करंट एक ही !

***********************************

कमियाँ अपनी देखो !जब तक अपनी कमी देखने और स्वयं स्वीकारने के आदत नही बनेगी कमी दूर हो ही नही सकती |

*********************************

पुरुषार्थी और परमार्थी बन कर जीवन जिओ,प्रमादी और स्वार्थी बनकर नही |

**********************************

भाव में कपट ओर स्वभाव में कटुता नही ; सहजता,सरलता भवन को भी अपना बनाती हैं,संसार को भी |

***********************************
समुद्र में हीरे-मोती ,जवाहरात का अपार भण्डार हैं |किनारे खड़े रह कर नही प्राप्त होगा |
आवश्यकता हैं भीतर गहरा उतरने की

*********************************
चिलम भी मिटटी से बनती हैं ,
सुराही भी |
चिलम ताप्ती हैं ,तपाती हैं |सुराही शीतल रहती हैं,शीतलता देती हैं |सुराही की तरह बनो,चिलम नही |

**********************************

मंत्र जाप एवं ध्यान साधना दवारा भीतर की गहन साम्राज्य में प्रवेश करो |विश्वाश रखो -भीतर सब कुछ हैं-ऊर्जा,ओज,प्रकाश ,ज्ञान-आनंद |
******************************

उस परमात्मा का साथ कभी नही छोड़ो ,जो कभी साथ नही छोड़ता |

***********************************

जिज्ञासा और विश्वास की कमी ही हमारे कल्याण में सबसे बढ़ी बाधा हैं |
*****************

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-6

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे
व्यवहार काल में भगवान नही भूले ,लेकिन भगवान की भजन ,साधन में संसार भूल जाये |

*********************************

अहंकार का त्याग प्रेम के दिव्य साम्रज्य का प्रवेश दवार हैं

******************************

अपना मन हो या कोई और -अच्छाई की प्रेरणा बने तो मित्र ! बुराई की ओर खींचे तो शत्रु !

*************************************

हम वहाँ नही जहां हमारा तन हैं ,वहाँ हैं -जहां मन हैं !व्यवहार करते हुए मन ईश्वरीय भाव में रखें | आप प्रभु में हैं और वह आप में !

**********************************

धैर्य और सहनशीलता का पाठ पक्का करो ,ऐसी में शांति और सदभाव् हैं !अधीरता, उतावलापन ,आवेश मानसिक अशांति और पारिवारिक दुर्भावना बढ़ाता हैं ,कार्य कुशलता कम करता हैं |

***********************************

लक्ष्य अच्छा ,भाव सच्चा और विश्वाश पक्का -श्री कृष्ण कृपा स्वतः अनुभव होगी

**************************************
पढ़ते कमाने के लिये ;कमाते हैं खाने के लिये ;खाते जीने के लिये ;क्या कभी सोचा -जीते हैं किस लिये ?

**************************************

बिगड़ी बुद्धि  को सवारे-वह सतसंग | अच्छी भली- बुद्धि को बिगाड़े-वह कुसंग !

********************************

वाणी से निकलने वाला दिन का प्रथम शब्द प्रभु नाम का हो ,सोने से पूर्व दिन के अंतिम शब्द के रूप में प्रभु ही वाणी पर हो |

******************************************

प्रेम शत्रु को भी मित्र  बना लेता हैं ,क्रोध मित्र को भी शत्रु |

**************************************
नींद के लिये ६ से ८ घंटे ,
दुकान या ऑफिस के लिये ८ से १० घंटे और परमात्मा के लिये इतने  मिनट भी धैर्य एवं एकाग्रता से नही -कहाँ तक उचित हैं ?

**********************************

लोक में शांति ओर परलोक में उद्धार केवल परमात्मा का होकर ही संभव हैं,संसार का होकर नही |

*************************************

कुसंग से बचो, सतसंग में लगो |
सतसंग उत्थान हैं कुसंग पतन !

***********************************

जैसा संग वैसा विचारो का रंग ,जैसे विचार वैसे कर्म ,जैसे कर्म वैसे आदते,जैसे आदते वैसे मनुष्य |इसीलिए कहाँ जाता हैं -मनुष्य के पहचान उसकी संगति से हैं |

***************************************

प्रत्येक आने वाला दिन पिछले दिन के अपेक्षा अच्छा हो -ऐसी जागरूकता जीवन को सतत अच्छाई की ओर प्रेरित करती रहेगी |

******************************************
ज्ञान का अभिमान नही लेकिन अभिमान का ज्ञान अवशय रहे |

*********************************

जीवन चिन्ताओ में रोने, अज्ञानता के नींद सोने ,अनमोल श्वांस व्यर्थ खोने ,कामनाओ का बोझा ढोने के लिये ही नही ,जिस परमत्मा ने जीवन ओर जीवन में सब दिया ,उसका होने के लिये हैं |

*******************

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-5

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे

सेवा में तनिक भी अहंभाव नही |मैं नही कर रहा ,भगवत-कृपा से हो रहा हैं;यह भाव बनाएं |
  
*****************************************

"खुले रहो खिले रहो ,खली रहो '-ऐसे जीवन और पारिवारिक जीवन का आदर्श बनाओ
***************************************

जो पास हैं ,वह सब प्रभु की कृपा,जो दिख रहा हैं,वह सब उसकी लीला ,सब प्राणियों में उसी की सत्ता ;मैं -मेरा कही नही |ऐसे भाव से प्रेम स्वतः बढ़ेगा |

**********************************
जीवन रूपी रथ का सारथि हैं बुद्धि ! अर्जुन बन जाओ ,सारथि श्री कृष्ण को बना लो ; जीवन संग्राम में विजय निश्चित हैं !


**************************************

जब अहंकार में जीते हैं तो स्वयं को बहुत बोना ,बहुत छोटा बना लेते हैं ! अहंकार से ऊपर उठ कर देखो -सब अपने हैं और आप सब के 

***************************************

सामर्थ्य यही मिली हैं ,यही रहनी हैं ! प्रभु की भाव से किया गया सदुपयोग यह सम्मान बढ़ाएगा ,आगे साथ निभाएगा |

****************************************

जब तक भीतर चिंता -चिंतन एवं वृत्तियों -विकारो से भरे रहोगे ,तब-तक खाली ही हो |
अंदर से खाली हो जाओ ; प्रेम ,शांति,करुणा ,आनंद और कृपा से भर जाओगे |

************************************** 

माता पिता बड़े-बुजुर्गो का सम्मान अत्यावश्यक हैं |उनकी प्रसन्नता का कारण बनो परेशानी का नही ||

**************************

प्रेम संसार की सब से मूलयवान सम्पदा हैं |मन में प्रेम ,परिवारो में प्रेम ,समाज में पारिवारिक प्रेम और प्रभु से प्रेम-यही स्वर्ग हैं ,यही कलयुग में भी सतयुग |

**********************************

सामर्थ्य की सदुपयोग का नाम ही सेवा हैं | सेवा सच्ची मानवता हैं ,सेवा परमात्मा की सहज पूजा और सीधी प्रसन्नता हैं
|
**********************************

काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार,ईर्ष्या-द्वेष आदि वृत्तियों में ही नही जियो  ईश्वरीय प्रेम और कृपा में जीने का आनंद लो ईर्ष्या,द्वेष,मत्सर,आक्रोश की अग्नि में मत जलो;प्रेम ,भक्ति-भाव,सदभाव की शीतल धारा में डुबकी लगाओ |

*****************

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-4

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे
पहले भजन फिर भोजन |संभव हो तो और दृढ़ता -भजन नही तो भोजन नही
***************************************

गंगा जी की तीव्र प्रवाह को देखो |
तो जल दिख रहा हैं ,वह नही दिख रहा ! आपके देखते ही आगे निकल गया ,समय की स्थिति भी यही हैं

***************************************

प्रातः काल शीघ्र उठकर कुछ समय केवल भजन ध्यान | ' मैं ओर मेरे प्रभु ' और कुछ नही कोई नही | धीरे -धीरे मैं भी नही ,बस तू ही तू ...तू ही तू |

***************************************

सबसे पहला काम -प्रभु का नाम ; फिर हर काम ,प्रभु के नाम !

****************************************

घर से बाहर जाते हुए भगवान का स्मरण और घर में प्रवेश करते हुए भगवान के कृपा का धन्यवाद करते रहो |

****************************************

प्रातः काल उठते ही कृपा का स्मरण करो !आँख भी खुली हैं तो कृपा से ! दिन भर कृपा बनी रहे -ऐसे ही प्रार्थना करो |

*****************************************

सामर्थ्य प्रभु के दी हुई हैं ,उन्ही की मान सदुपयोग करो ,दुरूपयोग नही |

*****************************************

मैं कितना भाग्यशाली हूँ,प्रभु की कितनी कृपा हैं जो वे मुझसे अपनी सेवा करवा रहे हैं ; यह भाव सेवा में विनम्रता लाएगा ,आह्लाद बढ़ाएगा

******************************************

विनम्रता कमजोरी ,कायरता या हल्कापन नही ;ऊँचे भवन की गहरी और मजबूत नीव हैं |

****************************************** 

रात्रि शयन से पूर्व परिवार की सभी सदस्य एक बार अवशय इकठ्ठे बैठे |कुछ समय भजन ,कीर्तन ,आरती मिलकर करे |
सुख समृदि ,सदभावना,भक्ति भावना और शुद्ध सात्विक संस्कार परिवार में स्वतः बढ़ने लगेंगे |

******************************************

उदार बनो ,संकीर्ण नही ;सरल बनो ,कठोर नही ; विनम्र बनो अहंकारी नही
******************************************


क्या लए थे ? क्या लेकर जायंगे ?
यही मिला हैं,यही के लिये मिला हैं |
दुरूपयोग से बचो ,जितना हो सके सदुपयोग कर लो |


*********************

Sunday, 8 November 2015

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-3

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे

संसार आने -जाने वाला हैं,
आने -जाने वाला सुख ही देगा |
सदा रहने वाली शांति चाहते हो तो
सदा रहने वाले परमात्मा में मन लगाओ |

******************************************

संसार शारिरिक सुख सुविधाये दे सकता हैं ,मानसिक शांति नही ! मानसिक शांति का आधार परमत्मा हैं |

******************************************
  
शरीर की यात्रा का अंतिम पड़ाव शमशान हैं जीव की यात्रा का अंतिम पड़ाव भगवान !

**************************************

समय की गति न तेज़ होती हैं न कम | समय एक गति से चल रहा हैं |अंतर इतना हैं ,आनंद की पलो में समय बीतते पता ही नही चलता,दुःख अशांति का एक मिनट भी भारी एवं लम्बा लगता हैं |

***************************************

भोजन 'स्वाद' लेकर नही  'प्रसाद' मान कर खाओ |

**************************************

समय की महत्व को समझो,समय आप का महत्व बढ़ा देगा |
समय का सदुपयोग करने की आदत बनाओ,समय आपको ऊँचा उठा देगा |

*****************************************

शरीर की गति स्वतः स्वभावत: श्मशान की ओर हैं |
जीव की गति भगवान की ओर हो,प्रयत्न पुरुषार्थ तो इस लिये करना हैं |

******************************************

आकाश कृष्ण कृपा की छत्रछाया हैं ,वायु उसकी कृपा की झोंके,जल कृपा की शीतलता,अग्नि कृपा का तेज़ और पृथ्वी कृपा का ही आधार -सर्वत्र कृपा देखने एवं अनुभव करने का स्वभाव बनाओ |

******************************************

सेवा अहसान नही,कर्तव्य की पहचान हैं |प्रदर्शन नही,अहम का समर्पण हैं |

************

विचार मन्थन-विचार जो जीना सीखा दे-2

श्री कृष्ण कृपा 
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे

बिता समय लौटता नही, हाथ का समय हाथ में रहता नही,
सदुपयोग या दुरूपयोग हाथ में हैं | सोचो-क्या करना उचित हैं?

******************************************

जिसका संसार हैं,उसी का मान कर उपयोग करो,बंधन और चिन्ताओ से बचे रहोगे |

******************************************

यह संभव हैं कि किसी का किसी से संयोग न हो ; लकिन संयोग होकर वियोग न हो,यह असंभव हैं |

******************************************

एक बार उससे मिलने कि प्रबल जिज्ञासा जगाओ जो मिलकर बिछुड़ता नही, जिसके मिलने पर सब कुछ मिल जाता हैं|

******************************************

संसार जब भी,जहां भी ,जिसे भी मिलता हैं ,अधूरा मिलता हैं | अधूरा संसार पूरी शांति कैसे दे ? अनित्य संसार में नित्य शांति कहा ?

******************************************

दृष्टि बदल लो, सृष्टि बदल जायेगी | दृष्टि में परमात्मा को रखो,सृष्टि का सब कुछ उसी कि शक्ति  लीला या कृपा के रूप में दिखाई देगा | 

******************************************

कृपा पर दृष्टि रखोगे तो भगवान के  'कृपा दृष्टि'' बानी रहेगी |

**************************************

परमात्मा हर कण में हैं,हर पल में हैं ,उन्हें हर जगह हर समय अपने साथ अनुभव करो |

**************************************

संसार जैसा दिख रहा हैं,वैसा हैं नही | दिखता हैं नित्य ,हैं अनित्य ;दिखता हैं सुख रूप ,हैं दुःख रूप !

**************************************


संसार में रहो लेकिन संसार के बनो नही ; बनो उसके जो अपना बन सकता हैं | 

**************