श्री कृष्ण कृपा
विचार मन्थन -विचार जो जीना सीखा दे
बिता समय लौटता नही, हाथ का समय हाथ में रहता नही,
सदुपयोग या दुरूपयोग हाथ में हैं | सोचो-क्या करना उचित हैं?
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जिसका संसार हैं,उसी का मान कर उपयोग करो,बंधन और चिन्ताओ से बचे रहोगे |
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यह संभव हैं कि किसी का किसी से संयोग न हो ; लकिन संयोग होकर वियोग न हो,यह असंभव हैं |
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एक बार उससे मिलने कि प्रबल जिज्ञासा जगाओ जो मिलकर बिछुड़ता नही, जिसके मिलने पर सब कुछ मिल जाता हैं|
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संसार जब भी,जहां भी ,जिसे भी मिलता हैं ,अधूरा मिलता हैं | अधूरा संसार पूरी शांति कैसे दे ? अनित्य संसार में नित्य शांति कहा ?
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दृष्टि बदल लो, सृष्टि बदल जायेगी | दृष्टि में परमात्मा को रखो,सृष्टि का सब कुछ उसी कि शक्ति लीला या कृपा के रूप में दिखाई देगा |
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कृपा पर दृष्टि रखोगे तो भगवान के 'कृपा दृष्टि'' बानी रहेगी |
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परमात्मा हर कण में हैं,हर पल में हैं ,उन्हें हर जगह हर समय अपने साथ अनुभव करो |
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संसार जैसा दिख रहा हैं,वैसा हैं नही | दिखता हैं नित्य ,हैं अनित्य ;दिखता हैं सुख रूप ,हैं दुःख रूप !
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संसार में रहो लेकिन संसार के बनो नही ; बनो उसके जो अपना बन सकता हैं |
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कृपा पर दृष्टि रखोगे तो भगवान के 'कृपा दृष्टि'' बानी रहेगी |
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परमात्मा हर कण में हैं,हर पल में हैं ,उन्हें हर जगह हर समय अपने साथ अनुभव करो |
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संसार जैसा दिख रहा हैं,वैसा हैं नही | दिखता हैं नित्य ,हैं अनित्य ;दिखता हैं सुख रूप ,हैं दुःख रूप !
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संसार में रहो लेकिन संसार के बनो नही ; बनो उसके जो अपना बन सकता हैं |
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